हम दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाएं, उम्र के किसी भी पड़ाव पर पहुंच जाएं, लेकिन बचपन की यादें कभी भी भूल नहीं पाते हैं | चाहे दोस्तों के साथ स्कूल जाना हो या बचपन के खेल, इनकी याद आते ही बचपन में लौट जाने का मन करता है| बचपन में हमारे हिंदी के पाठ्यक्रम की कविताएं भी हम भूल नहीं पाते हैं| यदि वक्त की गर्द से कुछ स्मृतियां धूमिल पड़ गई हो तो आइये हम आपको फिर बचपन की सौंधी खुशबू फैलाती कविताएं पढ़वाते हैं|
वीररस से ओत-प्रोत कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान
उठो लाल अब आँखे खोलो
उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लायी हूँ मुंह धो लो।
पानी लायी हूँ मुंह धो लो।
बीती रात कमल दल फूले,
उसके ऊपर भँवरे झूले।
चिड़िया चहक उठी पेड़ों पे,
बहने लगी हवा अति सुंदर।
नभ में प्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।
उसके ऊपर भँवरे झूले।
चिड़िया चहक उठी पेड़ों पे,
बहने लगी हवा अति सुंदर।
नभ में प्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।
भोर हुई सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
नन्ही नन्ही किरणें आई,
फूल खिले कलियाँ मुस्काई।
इतना सुंदर समय मत खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
नन्ही नन्ही किरणें आई,
फूल खिले कलियाँ मुस्काई।
इतना सुंदर समय मत खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।
बड़े सवेरे मुर्गा बोला
बड़े सवेरे मुर्गा बोला,
चिड़ियों ने अपना मुँह खोला,
चिड़ियों ने अपना मुँह खोला,
आसमान में लगा चमकने ,
लाल-लाल सोने का गोला ,
लाल-लाल सोने का गोला ,
चल रे मटके टम्मक टू
हुए बहुत दिन बुढ़िया एक
चलती थी लाठी को टेक
उसके पास बहुत था माल
जाना था उसको ससुराल
मगर राह में चीते शेर
लेते थे राही को घेर
बुढ़िया ने सोची तदबीर
जिससे चमक उठी तक़दीर
मटका एक मंगाया मोल
लंबा लंबा गोल मटोल
उसमे बैठी बुढ़िया आप
वह ससुराल चली चुपचाप
बुढ़िया गाती जाती यूँ
चल रे मटके टम्मक टूँ
लोभी भाई
एक बहुत था लोभी भाई,जिसकी ज्यादा थी न कमाई
रूखी-सूखी रोटी खाता,दुःख से अपना समय बीतता-
पर किस्मत ने पलटा खाया,लोभी के घर में धन आया
उसने मुर्गी पाली एक, जो थी सीधी-साधी नेक
रूखी-सूखी रोटी खाता,दुःख से अपना समय बीतता-
पर किस्मत ने पलटा खाया,लोभी के घर में धन आया
उसने मुर्गी पाली एक, जो थी सीधी-साधी नेक
ज्यों ही होता रोज सबेरा,वह करती कुकड़ू-को टेरा
दो सोने के अंडे प्यारे, वह देती थी उठ दिन सारे
दो सोने के अंडे प्यारे, वह देती थी उठ दिन सारे
जब लोभी ने अंडा पकड़ा, ख़ुशी-ख़ुशी से समय बिताता
पर लोभी जी में ललचाया,यह विचार उसके मन में आया
पर लोभी जी में ललचाया,यह विचार उसके मन में आया
क्यों न मार मुर्गी को डालूं,अंडे सारे साथ निकालूँ
हो जाऊंगा मालामाल,हेट रोज का ये जंजाल-
लोभी फ़ौरन चाकू लाया,मुर्गी मारी खून बहाया
अंडे उसने एक न पाया,रो-रो वह बहुत पछताया…
हो जाऊंगा मालामाल,हेट रोज का ये जंजाल-
लोभी फ़ौरन चाकू लाया,मुर्गी मारी खून बहाया
अंडे उसने एक न पाया,रो-रो वह बहुत पछताया…


